सोमवार, 7 मई 2007

मुझे याद आते हैं आप


हथेलियों की धुन्धलाती लकीरों के बीच इक अक्स उभर आता है,
उदास दुपहरी का सन्नाटा चीखती मुस्कराती यादों से भर जाता है ।

मैं जितना भुलाना चाहूँ उतनी ही तीखी चुभती हैं शमशीरें,
मैं जितना अनदेखा करूं उतनी ही गहरी होती जाती हैं तसवीरें।

आपका काँपता हाथ जब भी छू जाता था, कुछ बातें कह जाता,
पर लापरवाही के मद में मैं, उनको छूने से रह जाता ।

आज मुझे याद आती है हथेलियों की जुबां से निकलती बातें,
आज मुझे सताती हैं वो जो आपसे ना हो सकी वो मुलाकातें ।


मेरी हताशा, मेरी निराशा को आज भी आपके बोलों का सहारा है

मेरे मन का हर इक अंधियारा आप ही के उजालो से हारा है ।


मैंने आपका पाया अक्स और वो ही अक्स आपका पोता है लाया

मैं कैसे भूलूं आपको, हर क्षण जीवन का मैंने आपसे है पाया ।


घर के आंगन में चाहा आपने मम्मी हो खुश और बहू सुशील

चाहा आपने सब बच्चों को कोई कमी नहीं हो 'फील' ।


आपने जो देखा था सपना, देखो तो अब वो सच होने लगा है
खुशिया हैं सारी पास फिर भी क्यूँ आज दिल रोने लगा है ।


पापा जी! पर मैं आदत से बाज नही आया हूँ अब तक

माँगता ही रहूंगा कुछ आपसे, सांस चलेगी तब तक ।


गदहा पच्चीसी के दौर में मुझसे हुयी भूलों को आप भुला दो

आज फिर मुझे याद आते हैं आप, प्लीज़ मुझे रुला दो ।




1 टिप्पणी:

ePandit ने कहा…

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