गुरुवार, 17 मई 2007

सत्संग कि उमर में Santaan


“बुधिओं का टला”-इस राजस्थानी नाम का मोटा-मोटा अर्थ निकला जाये तो ये वोह जगह होगी जहाँ के अधिकांश निवासी बूढ़े हो. लेकिन इस नाम वाला, बाड़मेर ज़िले का, एक गावं युवाओं के लिए एक पहेली बन चुक्का है. हाल ही में गावं के ८८ वर्षीया बिरमा राम कि तीसरी पत्नी ने जुड़वाँ पुत्रो को जन्म दिया और अपनी ‘सक्रियता’ के लिए विख्यात इस “चिर युवा” कि उपलब्धियों में नवीनतम अध्याय जुड़ गया.

भारत-पाकिस्तान सीमा से जुडे थार रेगिस्तान में बिखरे कच्चे मकानों वाले लगभग गुमनाम से इस गावं का नाम खबरों मे लाने वाले बिरमा राम श्रीलाल शुक्ल के प्रसिद्ध हिंदी उपन्यास “राग दरबारी” के वेध्या जी के उस सिद्वांत को जीते हुवे प्रतीत होते हैं कि, “जीवन में सबसे बड़ी बात है वीर्य कि रक्षा. इसे बचा लिया तो समझो सब-कुछ बच गया.”

बिरमा राम के दावे को मने तो ये घटना और भी अविश्वसनीय लगती है. “दरअसल मेरी उमर ९० साल है. सरकारी रेकॉर्ड में ये गलती से दो साल कम लिखी हुई है. जब में ७४ साल का था तो मेरे पहली संतान- एक बेटी हुई. इसके बाद अब मेरे जुड़वाँ बेटे हुवे. एक कि जन्म के कुछ घंटों बाद ही मौत हो गयी. दूसरा एक दम स्वस्थ है. अब आगे भी में कोई बंदिश नही चाहता. भगवन चाहेगा तो और बचा हो जाएगा,” बिरमा राम केमरा के सामने पोज़े देने से पहले कंघी निकाल कर अपनी मूंछेंसवारते हुवे बताते हैं.

हिंदी का पुलिस ब्लोग

पिछले छिट्ठे के जवाब में मिले रेसपोंस को देख कर उत्साह बढ़ा। मित्रों ने आशंका जतायी है कि ऐसे प्रयास लंबे समय तक चलें या ना चलें क्या पता? नितिन दीप जी से मिल कर तो उम्मीद बांधती है कि ऐसा ही होगा। आप और हम उत्साह बधायेंगे तो ये लंबी दौड़ पर निकलेगा।

भारत का पहला हिंदी पुलिस ब्लोग

यदि हम आपसे पूछे कि बोस्टन मेट्रोपोलिटन पुलिस, कर्नाटक के उदुपी और चित्रदुर्गा जिला पुलिस और जाने-माने लोस एंजेलेस पुलिस विभाग में क्या समानता है तो आप शायद सिर खुजलाने को मजबूर हो जाये. एक दुसरे से लाखो मील दूर अलग-अलग कानूनों के तहत काम करने वाले ये पुलिस विभागो को एक-सूत्र में ये बात पिरोती है कि इन सभी ने जनता और पुलिस के बीच कि खायी को पाटने के लिए सुचना टेक्नोलॉजी का सूझ-बूझ भरा उपयोग किया है। अधिक जानकारी के लिए www.barmerpolice.blogspot.com देखें।

सोमवार, 7 मई 2007

मुझे याद आते हैं आप


हथेलियों की धुन्धलाती लकीरों के बीच इक अक्स उभर आता है,
उदास दुपहरी का सन्नाटा चीखती मुस्कराती यादों से भर जाता है ।

मैं जितना भुलाना चाहूँ उतनी ही तीखी चुभती हैं शमशीरें,
मैं जितना अनदेखा करूं उतनी ही गहरी होती जाती हैं तसवीरें।

आपका काँपता हाथ जब भी छू जाता था, कुछ बातें कह जाता,
पर लापरवाही के मद में मैं, उनको छूने से रह जाता ।

आज मुझे याद आती है हथेलियों की जुबां से निकलती बातें,
आज मुझे सताती हैं वो जो आपसे ना हो सकी वो मुलाकातें ।


मेरी हताशा, मेरी निराशा को आज भी आपके बोलों का सहारा है

मेरे मन का हर इक अंधियारा आप ही के उजालो से हारा है ।


मैंने आपका पाया अक्स और वो ही अक्स आपका पोता है लाया

मैं कैसे भूलूं आपको, हर क्षण जीवन का मैंने आपसे है पाया ।


घर के आंगन में चाहा आपने मम्मी हो खुश और बहू सुशील

चाहा आपने सब बच्चों को कोई कमी नहीं हो 'फील' ।


आपने जो देखा था सपना, देखो तो अब वो सच होने लगा है
खुशिया हैं सारी पास फिर भी क्यूँ आज दिल रोने लगा है ।


पापा जी! पर मैं आदत से बाज नही आया हूँ अब तक

माँगता ही रहूंगा कुछ आपसे, सांस चलेगी तब तक ।


गदहा पच्चीसी के दौर में मुझसे हुयी भूलों को आप भुला दो

आज फिर मुझे याद आते हैं आप, प्लीज़ मुझे रुला दो ।




शुक्रवार, 4 मई 2007

गिद्ध


जिन लोगों को भूख सताए, मत दो उनको कोई निवाला।

झूम रहे जो लोग नशे में, फिर से भर दो उनका प्याला।।


रोष में देखो लोग खडे हैं, पकडा दो तुम उनको पत्थर।

कोशिश कर के देखो ज़रा, यदि जला दें वे कुछ-इक घर॥


जिस घर से धुआं दिखता हो, चलो वहाँ पर आग दिखा दें।

जहाँ नज़र आता हो कुँआ, जा कर उसमें भांग मिला दें॥


ढूंढें सरकते पल्लुओं, सिसकते चेहरों और सनसनी को।

नहीं मिले तो सरकाओ या सिसकाओ और पैदा करें॥

ब्रेकिंग न्यूज़, एक्सक्लूसिव और सिर्फ इसी चैनल पर।

सारे चैनल तरस रहे हैं चौबीस घंटो मसाले को॥


गिद्ध भोज की भाग-दौड़ में, कौन संभाले गिरतों को।

मत उठाओ, क्लिक करो बस, खबर अपनी बनाने को॥



फोटो साभार - डाक्टर छंगानी







गुरुवार, 3 मई 2007

क्यूँ आता नहीं बसंत

क्यूँ आता नहीं बसंत ...

जब भी चलती सर्द हवाएं
विपदा और व्यथा की
मैं ह्रदय तरु से जा मिलाटा
और
करता बात ह्रदय
पर एक बात से कर देता वो
सब बातों का अंत
पतझड़ हुआ बरसो बीते
क्यूँ आता नहीं बसंत।